महाराष्ट्र, यूपी और दिल्ली की कई बड़ी कंपनियों ने अपने एजेंटों के माध्यम से गेहूं की खरीद की। यही नहीं उन्होंने गेहूं खरीदकर विदेश भी भेजा। बाद में निर्यात पर रोक लगा तो इन्होंने इसका अपने यहां भंडारण कर लिया। बिहार में इस बार रिकॉर्ड कम खरीददारी हुई है। 10 लाख टन के लक्ष्य के विरुद्ध मात्र 3 हजार टन की ही खरीद हुई है। इस बार गेहूं की सरकारी खरीद दर 2015 रुपए प्रति क्विंटल थी। इसकी जगह किसानों को बाजार से 2200 रुपए तक की कीमत मिली।
राज्य का गेहूं खरीद लक्ष्य 22 लाख क्विंटल है। लेकिन, अब तक 248 खरीद केंद्रों पर 20 हजार क्विंटल के लगभग ही खरीद हुई है। अधिसंख्य स्थानों पर स्थानीय कारोबारियों ने ही किसानों से खरीद कर गेहूं का भंडारण कर लिया। यहां सरकारी मूल्य 2015 रुपए प्रति क्विंटल है। इस पर प्रति क्विंटल 20 रुपए राज्य सरकार ने बोनस भी दिया। इससे गेहूं का सरकारी भाव प्रति क्विंटल 2035 रुपए हो गया। उधर, खुले बाजार में किसानों को 2200 से 2300 रुपए प्रति क्विंटल तक भाव मिला। लिहाजा, किसानों ने सरकारी खरीद में रुचि नहीं ली। कई जगह व्यापारियों ने किसानों के खेतों से ही गेहूं खरीद कर उठाया। यहां के प्रमुख बाजार कुमाऊं में गेहूं की सरकारी खरीद का लक्ष्य 1.60 लाख क्विंटल रखा गया था लेकिन खरीद महज 7240 क्विंटल ही हुई।
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