याचिकाकर्ता श्रेया सिंघल ने इस फैसले पर कहा, 'यह कानून लोकतंत्र विरोधी था. सरकार लोगों को बोलने नहीं देना चाहती. आप वह कंटेंट देखिए जिसके कारण लोगों को जेल भेजा गया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके कारण किसी को जेल में भर दिया जाए. यह फैसला संविधान और जनता दोनों की जीत है' अब किसी को कुछ बोलने या लिखने से पहले यह सोचकर नहीं डरना होगा कि उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है.हालांकि सरकार ने इस याचिका के विरोध में कहा था कि यह एक्ट वैसे लोगों के लिए है जो सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक चीजें पोस्ट कर शांति को खतरा पहुंचाना चाहते हैं. सरकार ने कोर्ट में इस एक्ट के बचाव में यह दलील दी थी कि क्योंकि इंटरनेट की पहुंच अब बहुत व्यापक हो चुकी है इसलिए इस माध्यम पर टीवी और प्रिंट माध्यम के मुकाबले ज्यादा नियमन होना चाहिए.कोर्ट ने सरकार के तमाम तर्कों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुना दिया है. अब सरकार सोशल मीडिया पर डाले गए पोस्ट के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती. हालांकि सरकार के पास यह अधिकार होगा कि यदि कोई पोस्ट उसे आपत्तिजनक लगता है तो वह उसे हटवा सकती है. कोर्ट ने अपने फैसले में लोहिया का उदाहरण देते हुए कहा, भारत जैसे देश में अभिव्यक्ति की आजादी से किसी सूरत समझौता नहीं किया जा सकता.
Digital Desk: Shiv Kishor
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