राज नारायण बसु और स्वदेशी चेतना का किया जिक्र
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने बंगाल के विचारक राज नारायण बसु का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राज नारायण बसु के जन्म के 200 वर्ष पूरे हो गए हैं। उन्होंने लोगों को अपनी संस्कृति और पहचान के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से हिंदू मेले की शुरुआत की थी। इस पहल के माध्यम से स्वदेशी विचारों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।
आचरण के लिए सही और गलत की समझ जरूरी
मोहन भागवत ने समाज में आचरण और संस्कारों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि पहले लोगों को व्यवहार की सीख परिवार, पड़ोस, किताबों और समाज से मिलती थी। लेकिन धीरे-धीरे इन माध्यमों का प्रभाव कम होता जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि विवेक के बिना सही आचरण कैसे संभव है।
इस बात को समझाने के लिए उन्होंने शराबबंदी के प्रचार से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार गांव में लोगों को शराब के नुकसान समझाने के लिए शराब में कीड़े डालकर दिखाए गए और पूछा गया कि इससे क्या सीख मिलती है। इस पर एक शराब पीने वाले व्यक्ति ने जवाब दिया कि इससे पेट के सारे कीड़े मर जाएंगे।
भागवत ने इस उदाहरण के जरिए समझाया कि कई बार किसी बात को समझाने का उद्देश्य कुछ और होता है, लेकिन लोग उसका अर्थ अलग निकाल लेते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को नशीले पदार्थों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी होती है, फिर भी वे उनका सेवन करते हैं। इसलिए किसी भी व्यवहार को अपनाने से पहले उसके सही और गलत पक्ष को समझना जरूरी है।
विकास के साथ पर्यावरण और नैतिकता का संतुलन जरूरी
संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां हैं। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना तथा अलग-अलग विचारों और पृष्ठभूमि वाले लोगों के साथ सामंजस्य स्थापित करना बड़ी जरूरत है। उन्होंने नई पीढ़ी में संस्कारों के कमजोर पड़ने और प्रकृति से जुड़े संकटों के साथ बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव पर भी चिंता जताई।
भागवत के अनुसार, दुनिया इन समस्याओं के समाधान तलाश रही है और भारत से भी उम्मीदें रखती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास का रास्ता ऐसा होना चाहिए, जिसमें प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों की अनदेखी न हो।
नेपाल की घटनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्यों के दौरान प्रकृति की संवेदनशीलता को ध्यान में रखना जरूरी है। तकनीक और विकास को बढ़ावा देने के बावजूद बड़े पैमाने पर जनहानि जैसी घटनाएं गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
उन्होंने कहा कि विकास ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसमें विकास करने वाले लोगों की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाए। ज्ञान और तकनीक को आगे बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन अर्थव्यवस्था के साथ पर्यावरण और नैतिकता को भी समान महत्व देना होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी नई तकनीकों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल किस उद्देश्य से और किस तरह किया जा रहा है, यह सबसे महत्वपूर्ण है।
नई पीढ़ी को भारत की जिम्मेदारी के लिए तैयार करना होगा
भारत को विश्वगुरु बनाने के विचार पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इस लक्ष्य को पूरा करने की जिम्मेदारी आने वाली पीढ़ी के कंधों पर होगी। इसके लिए युवाओं को अभी से तैयार करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि तकनीक के लाभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन तकनीक और ज्ञान अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं हैं। इनका महत्व इस बात से तय होता है कि इनका उपयोग समाज और देश के हित में किस प्रकार किया जाता है। नई पीढ़ी को केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसमें विवेक, संस्कार और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी जरूरी है।
राष्ट्रीय एकता को बताया देश की ताकत
अपने संबोधन में भागवत ने राष्ट्रीय एकता पर जोर देते हुए कहा कि जब लोग एक सूत्र में बंधकर रहते हैं, तो उन्हें कमजोर करना आसान नहीं होता। उन्होंने बंगाल विभाजन का उदाहरण देते हुए कहा कि लॉर्ड कर्जन ने हिंदू-मुस्लिम आधार पर बंगाल का विभाजन किया था, लेकिन चार साल बाद इसे वापस लेना पड़ा।
उन्होंने 1947 के विभाजन का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय समाज में यह सोच मजबूत हो गई थी कि अलग दिखाई देने वाले लोग अलग ही हैं। भागवत ने तुष्टिकरण की राजनीति को भी विभाजनकारी मानसिकता को बढ़ावा देने वाला बताया।
उन्होंने कहा कि विभाजन के समय शांति और सुख की जो उम्मीदें रखी गई थीं, वे पूरी नहीं हुईं। आज भी सीमाओं पर अशांति बनी हुई है। ऐसे में लोगों को अपने छोटे-छोटे अहंकार से ऊपर उठकर देश के लिए काम करना चाहिए। उन्होंने देश के प्रति समर्पण को नागरिकों का कर्तव्य बताया।
Digital Desk: Neha Sharma
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