चैटजीपीटी पर ‘प्लीज’ और ‘थैंक्यू’ लिखना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह?
(India) इन दिनों इंटरनेट पर यह चर्चा तेज है कि चैटजीपीटी से बात करते समय “प्लीज” और “थैंक्यू” जैसे शब्द लिखने से अतिरिक्त बिजली खर्च होती है और इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। तर्क दिया जा रहा है कि ज्यादा शब्दों का मतलब ज्यादा प्रोसेसिंग और ज्यादा ऊर्जा खपत। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ अतिरिक्त शब्दों से होने वाली ऊर्जा खपत बेहद मामूली होती है और इसका पर्यावरण पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ता। असली ऊर्जा खर्च तो उन विशाल डाटा सेंटर्स में होता है, जो एआई सिस्टम को चलाने के लिए लगातार काम करते हैं।
एआई को चलाने के लिए बड़े-बड़े सर्वर, शक्तिशाली कंप्यूटर और कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है, जिनमें भारी मात्रा में बिजली और पानी इस्तेमाल होता है। जब कोई यूजर सवाल पूछता है, तो एआई हर बार नया जवाब तैयार करता है, जिसे “इंटरफेरेंस” कहा जाता है। यही प्रक्रिया ऊर्जा खपत का मुख्य कारण बनती है। यानी मुद्दा यह नहीं है कि हम कितने शिष्ट शब्द इस्तेमाल करते हैं, बल्कि यह है कि एआई का उपयोग कितनी बार और कितनी बड़ी मात्रा में किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले वर्षों में डाटा सेंटर्स की बिजली खपत तेजी से बढ़ सकती है। साथ ही, इन्हें ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी भी खर्च होता है। ऐसे में यह जरूरी है कि एआई को सिर्फ एक डिजिटल टूल न समझा जाए, बल्कि एक ऐसे सिस्टम के रूप में देखा जाए जो असली संसाधनों पर निर्भर है। “प्लीज” और “थैंक्यू” न लिखने से भले ही पर्यावरण नहीं बचेगा, लेकिन यह बहस लोगों को एआई के असली प्रभाव को समझने की दिशा में जरूर ले जा रही है।

Author: JAN TV Editorial Team

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