2008 में बीजिंग ओलंपिक से अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली और 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर साइना ने भारत को पहला ओलंपिक बैडमिंटन मेडल दिलाया। यह सिर्फ एक पदक नहीं था, बल्कि लाखों लड़कियों के लिए उम्मीद का प्रतीक था। इसके बाद उन्होंने सुपर सीरीज खिताब, कॉमनवेल्थ गोल्ड, वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल और दुनिया की नंबर-1 रैंकिंग हासिल की। पुरुष और महिला, दोनों वर्गों में यह मुकाम पाने वाली वह पहली भारतीय बनीं।
लेकिन असली लड़ाई कोर्ट से बाहर थी—चोटों के खिलाफ। घुटनों की गंभीर समस्या, आर्थराइटिस और कार्टिलेज की टूटती हालत के बावजूद साइना ने कभी हार नहीं मानी। आखिरकार शरीर ने जवाब दे दिया और उन्होंने खेल को अलविदा कहा। पर उनकी विरासत अमर है। आज पीवी सिंधु से लेकर आने वाली नई पीढ़ी तक, हर खिलाड़ी में साइना की छाप दिखती है। वह सिर्फ चैंपियन नहीं थीं, वह एक सोच थीं—जो कहती है कि बेटियां भी इतिहास लिख सकती हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
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