हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन को लेकर केंद्र सरकार और Archaeological Survey of India (एएसआई) निर्णय ले सकते हैं। हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे 11वीं शताब्दी की कमाल मौला मस्जिद बताता है।
नई याचिका जेब्रान अंसारी नामक व्यक्ति की ओर से दायर की गई है, जिसमें 15 मई को दिए गए हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है। इससे पहले मस्जिद के कार्यवाहक काजी मोइनुद्दीन भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुके हैं।
वहीं, हिंदू पक्ष ने पहले ही सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर अनुरोध किया है कि मामले में किसी भी अपील पर उनका पक्ष सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए। यह कैविएट जितेंद्र सिंह ‘विशेन’ की ओर से अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दायर की गई।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एएसआई की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा था कि विवादित संरचना का संबंध परमार वंश के राजा भोज काल से है और यहां देवी सरस्वती मंदिर व संस्कृत शिक्षण केंद्र के अस्तित्व के संकेत मिले हैं।
अदालत ने एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया था, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी। साथ ही अदालत ने कहा था कि मुस्लिम पक्ष अलग से मस्जिद निर्माण के लिए भूमि आवंटन हेतु राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है।
भोजशाला परिसर लंबे समय से धार्मिक और ऐतिहासिक विवाद का केंद्र रहा है। एएसआई द्वारा 2024 में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण की 2000 से अधिक पृष्ठों की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मौजूदा संरचना से पहले वहां एक विशाल मंदिरनुमा ढांचा मौजूद था।
Author: JAN TV Editorial Team
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