जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल और जिला प्रशासन के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों में बेदखली का आदेश देने का अधिकार प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, सुरक्षा और गरिमा प्रदान करता है। अदालत ने कहा कि 'माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' का उद्देश्य बुजुर्गों के जीवन को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाना है, इसलिए इसकी व्याख्या भी उसी भावना के अनुरूप की जानी चाहिए।
यह मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की याचिका से जुड़ा था। गुप्ता ने जून 2022 में जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देकर अपने बेटे को मकान से बेदखल करने की मांग की थी। यह मकान उनकी स्वयं की खरीदी हुई संपत्ति थी।
मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि गुप्ता की 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू हुई।
सुनवाई के बाद एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया था। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
हालांकि बेटे और बहू ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 2007 का कानून माता-पिता को बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता, इसलिए उसने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में हस्तक्षेप करके गलती की। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा, भरण-पोषण और गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक हो, तो ट्रिब्यूनल बच्चों या अन्य परिजनों को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।
कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 7 के तहत गठित ट्रिब्यूनलों को धारा 8 के माध्यम से सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्रदान की गई हैं। वहीं धारा 27 सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। ऐसे में ट्रिब्यूनल को कानून के उद्देश्य को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल आवश्यक होने पर बेदखली का आदेश दे सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि इसी कानूनी सिद्धांत को बाद में समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) तथा कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) मामलों में भी दोहराया जा चुका है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण राहत लेकर आया है। इससे ऐसे बुजुर्ग माता-पिता को कानूनी संरक्षण मिलेगा जो अपनी ही संपत्ति में असुरक्षित महसूस करते हैं या परिवार के सदस्यों द्वारा प्रताड़ना का सामना कर रहे हैं।
Author: JAN TV Editorial Team
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