(DELHI, India)
यूपीए सरकार के समय भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक न्यायाधीश को पद पर बने रहने देने को लेकर देश के तीन प्रधान न्यायाधीशों के ‘अनुचित समझौते’ करने का आरोप लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने मंगलवार को इनमें से एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) आरसी लाहोटी के समक्ष इस मुद्दे पर छह सवाल खड़े किए। काटजू ने सवाल किया कि क्या अतिरिक्त न्यायाधीश के खिलाफ प्रतिकूल आईबी रिपोर्ट मिलने के बाद तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश लाहोटी ने तीन न्यायाधीशों वाले उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम की बैठक नहीं बुलाई थी, जिसमें वह खुद, न्यायमूर्ति वाईके सबरवाल और न्यायमूर्ति रूमा पाल शामिल थे तथा आईबी रिपोर्ट पर गौर करते हुए कोलेजियम ने भारत सरकार से अतिरिक्त न्यायाधीश का दो साल का कार्यकाल नहीं बढ़ाने की सिफारिश की थी? भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष काटजू ने अपने ब्लॉग में लाहोटी के समक्ष ये सवाल उठाए हैं। अपने बयान के समय के बारे में काट्जू ने सोमवार को कहा था कि कुछ लोगों ने मेरे बयान के समय को लेकर टिप्पणी की है। हुआ यह कि कुछ तमिल नागरिकों ने फेसबुक पर टिप्पणी की कि मैं फेसबुक पर कई मामलों को पोस्ट कर रहा हूं, ऐसे में मुझे मद्रास उच्च न्यायालय के अपने अनुभवों के बारे में भी पोस्ट करना चाहिए। इसके बाद मैंने अपने अनुभवों को पोस्ट करना शुरू कर दिया। और यही समय था जब मुझे यह वाकया भी याद आया ओैर मैने इसे भी पोस्ट कर दिया। काटजू ने सवाल किया कि क्या यह सही नहीं है कि तीन न्यायाधीशों वाले उच्च्तम न्यायालय के कोलेजियम की सिफारिश सरकार को भेजी गई तो इसके बाद उन्होंने (लाहोटी) ने कोलेजियम के अपने दो साथी न्यायाधीशों से विचार-विमर्श किए बगैर अपनी ओर से भारत सरकार को पत्र लिखा कि सरकार संबंधित न्यायाधीश को अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर एक साल का कार्यकाल और दे? अपने ब्लॉग में आगे कहा कि अगर जांच के बाद आईबी ने रिपोर्ट दी थी कि न्यायाधीश भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए हैं तो उन्होंने (न्यायमूर्ति लाहोटी) ने भारत सरकार से उच्च न्यायालय में इस अतिरिक्त न्यायाधीश का कार्यकाल एक साल बढ़ाने की सिफारिश भारत सरकार से क्यों की थी? नवंबर, 2004 में मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने काटजू ने सोमवार को टीवी चैनलों से कहा कि इन तीन पूर्व प्रधान न्यायाधीशों ने अनुचित समझौते किए। न्यायमूर्ति लाहोटी ने इसकी शुरूआत की। इसके बाद न्यायमूर्ति सब्बरवाल और न्यायमूर्ति बालकृष्णन ने इसे आगे बढ़ाया। ये ऐसे प्रधान न्यायाधीश थे जो समर्पण कर सकते हैं। क्या एक प्रधान न्यायाधीश को राजनीतिक दबाव के आगे समर्पण करना चाहिए अथवा उसे ऐसा नहीं करना चाहिए? बालकृष्णन ने उनके आरोपों को खारिज करते हुए इसे ‘पूरी तरह से आधारहीन और तथ्यहीन’ करार दिया है।
Author: JAN TV Editorial Team
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