जम्मू। महाराजा हरिसिंह के शासनकाल में जम्मू-कश्मीर का प्रसाशन बड़ा अच्छा था। पहले पोलिटिकल डिपार्टमेंट द्वारा चुने गए अधिकारियों के प्रशासन में और उसके बाद से गोपाल स्वामी अय्यंगार, महाराज सिंह और बीएन राव जैसे सुयोग्य भारतीय प्रशासकों के मातहत। महाराजा खुद भी कार्यक्षम और परिश्रमशील शासक थे। परंतु उनके चरित्र में अनिर्णय अथवा असमंजस का एक भारी दोष था। उनके शासन में पिछड़े हुए मुस्लिम वर्ग का राज्य सरकार में कोई हाथ नहीं था। 1932 में शेख अब्दुल्ला ने जो लोकप्रिय आंदोलन चलाया उसके बाद शासन को उदार बनाने का पहला कदम उठाया गया। आरंभ में वह कौमी आंदोलन था जो मुसलमानों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया गया था। 1931 में आंदोलन का कौमी स्वरूप खत्म कर दिया गया और पहले कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेस के नाम से पहचाने जाने वाली उनकी संस्था अब नेशनल कांफ्रेंस हो गई। आगे चलकर इसे देसी राज्य प्रजा परिषद के साथ जोड़ दिया गया। नेशनल कांफ्रेस महाराजा के खिलाफ आंदोलन चलाती रही और 1946 में कांग्रेस आंदोलन से प्रेरणा लेकर शेख अब्दुल्ला ने महाराजा कश्मीर छोड़ो आंदोलन छेड़ दिया। शेख गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें तीन साल की सजा हुई। नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया भी भावुकपूर्ण था।
नेहरू के प्रवेश पर थी रोक
स्वतंत्रता की लड़ाई कहीं भी और किसी के द्वारा भी चलाई जाए वे उसमें स्वभावतः कूद पड़ते थे। वे जून 1946 में अपने मित्रों को प्रोत्साहित करने के लिए कश्मीर जाकर उनसे मिलना चाहते थे लेकिन राजनीतिक आंदोलन के भय से राज्य सरकार ने नेहरू के प्रवेश पर रोक लाग दी। वे नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कांग्रेस वर्किंग कमेटी और सरदार पटेल इसके पक्ष में नहीं थे कि नेहरू राज्य का कानून तोड़े और वहां गिरफ्तार कर लिए जाएं। कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने उन्हें लौट आने का आदेश दिया। सरदार पटेल द्वारा 11 जुलाई 1946 को डीपी मिश्रा (मध्यप्रांत) को लिखे पत्र में नेहरू के इस कार्य का उल्लेख मिलता है। इस पत्र में पटेल ने लिखा है- अभी-अभी उन्होंने (नेहरू ने) ऐसी बातें की हैं जिनकी वजह से हमे बड़ी परेशानी हुई है। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप, कांग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनकी अखबारी परिषद (प्रेस कांफ्रेंस) ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबरदस्त तनाव में से गुजरना पड़ता है। परंतु इस सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम और उत्कट लगन है...।
Author: JAN TV Editorial Team
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