(India)
26 नवंबर संविधान दिवस के अवसर पर देश उन महान व्यक्तित्वों को याद करता है, जिन्होंने भारत के लोकतंत्र की बुनियाद खड़ी की। संविधान सभा में 15 महिला सदस्यों ने सक्रिय भागीदारी निभाई और कई संवेदनशील मुद्दों को आवाज दी। संख्या में कम होते हुए भी उन्होंने शिक्षा, समानता, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, आदिवासी अधिकार और महिला सशक्तिकरण को लेकर मजबूत दृष्टिकोण रखा। सरोजिनी नायडू ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की वकालत की, जबकि हंसा मेहता ने सुनिश्चित किया कि संविधान में पुरुष और महिला समान अधिकारों के साथ पहचाने जाएं। विजया लक्ष्मी पंडित ने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और सुचेता कृपलानी ने महिलाओं की शिक्षा व राजनीतिक भागीदारी पर जोर दिया। वहीं राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव रखे।
दुर्गाबाई देशमुख ने महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान और शिक्षा की मजबूती की मांग की, जबकि रेणुका रे ने महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता पर बल दिया। बेगम एजाज रसूल ने अल्पसंख्यक अधिकारों का प्रतिनिधित्व किया और पूर्णिमा बनर्जी ने समाजवादी विचारधारा और कमजोर वर्गों की आवाज उठाई। कमला चौधरी ने साहित्य और सामाजिक न्याय का मुद्दा आगे बढ़ाया, लीला रॉय और एनी मस्कारेन ने महिला और मजदूर अधिकारों पर संघर्ष किया, मालती चौधरी ने ग्रामीण विकास और शिक्षा को प्राथमिकता दी। अम्मू स्वामीनाथन ने महिलाओं को बराबर अधिकार मिलने की पुरजोर बात कही, जबकि दक्षिणानी वेलायुद्ध ने संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य के रूप में शोषित वर्गों के न्याय के लिए मजबूत आवाज बुलंद की। इन 15 महिलाओं के योगदान ने भारतीय लोकतंत्र को समावेशी, संवेदनशील और न्यायसंगत स्वरूप देने में निर्णायक भूमिका निभाई।
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