साल 2015 में लगभग 200 देशों के बीच पेरिस जलवायु समझौता हुआ था। इन देशों ने अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने का फैसला किया था। इसके तहत ग्लोबलवॉर्मिंग को दो डिग्री सेल्सियस तक नीचे लाने का लक्ष्य रखा था जिसे बाद में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ले जाने का प्रयास है। इस समझौते के तहत ग्रीन हाउस गैसेस के उत्सर्जन में 28 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सितंबर 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किया था। इस फैसले के तहत अमेरिका को गरीब देशों को तीन बिलियन डॉलर सहायता राशि देने पर सहमति बनी थी। 4 नवंबर 2016 से यह समझौता लागू भी हो गया था।
इस समझौते से अमेरिका के बाहर होने का मतलब अमेरिका सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है। दुनिया के कार्बन उत्सर्जन का करीब 15 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है। अगर अमेरिका इससे बाहर होता है तो दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन कम करने की कोशिशों को झटका लगेगा। इतना ही नहीं अमेरिका के बाहर होने से गरीब देशों केा मिलने वाली रकम पर भी असमंजस है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पेरिस समझौते के बारे में कहा था कि इसमें सबकी जीत है और अमेरिका ये नई टेक्नोलॉजी और नए शोध में पैसा लगाकर लाखों नौकरियां पैदा करने का मौका है।
भारत इस समझौते पर अमल करता रहेगा भले ही अमेरिका इससे अलग हो जाए। चीन का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से बचाव वैश्विक ज़िम्मेदारी है। रूस का कहना है कि अमेरिका के हाथ खींचने से पेरिस डील का प्रभाव घटेगा। ब्रिटेन ने कहा, अमेरिका से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की अपील करेगा। स्वच्छ ऊर्जा के लिए यूरोपियन यूनियन प्रतिबद्ध है।
Author: JAN TV Editorial Team
DISCLAIMER: इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।