गुरुवार को कमलापुर के विद्याज्ञान स्कूल आए राज्यपाल राम नाईक से यह पूछने पर कि अखिलेश सरकार अच्छी थी या योगी सरकार। उन्होंने कहा कि सरकार जनता चुनती है। मैं प्रदेश का राज्यपाल हूं। मुझे राष्ट्रपतिजी ने राज्यपाल बनाया है। मैं प्रतिमाह रिपोर्ट उन्हें भेज देता हूं। श्री नाईक ने कहा कि सरकार जनता बनाती और बिगाड़ती है। अखिलेश यादव ने जनता से अच्छी-अच्छी बातें की थीं। जनता को बातें पसंद आईं तो उन्हें सत्ता सौंप दी लेकिन जनता को बातों के साथ अच्छा काम भी चाहिए। काम नहीं पसंद आया तो जनता ने उन्हें हटाकर योगीजी को सत्ता सौंप दी। योगीजी भी अच्छी-अच्छी बातें कर रहे हैं। अब जनता को अच्छा काम चाहिए होगा। अच्छा काम होगा तो जनता निश्चित तौर पर अगले चुनाव में फिर योगीजी की सरकार चुनेगी।
सीतापुर। इंसान का सबसे बड़ा धर्म कर्तव्य पालन है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम भी कर्तव्य पालन के लिए वनवास गए थे। भगवान राम परिवारीजनों की इच्छा के विपरीत पिताधर्म का पालन करने के लिए वनवास गए थे। लक्ष्मणजी भाई धर्म तो सीताजी पत्नी धर्म के पालन के लिए।
ये बातें प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने कहीं। श्री नाईक गुरुवार को कमलापुर स्थित विद्याज्ञान स्कूल के नवनिर्मित स्पोर्ट्स स्टेडियम का लोकार्पण करने आए थे। व्यवस्थाएं और साफ-सफाई देखकर उन्होंने स्कूल की अध्यक्षा रोशनी नाडर मल्होत्रा की जमकर प्रशंसा की। स्कूल के छात्र-छात्राओं को किताबी कीड़ा न बनने की नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि प्रात:काल उठकर सबसे पहले खेलकूद व व्यायाम करें। शरीर चुस्त-दुरुस्त होता है तो मन व मस्तिष्क चैतन्य रहता है। चैतन्य मस्तिष्क एक बार किसी चीज को पढ़ लेने या देख लेने के बाद भूलता नहीं है। बस ध्यान इतना रखना है कि जब पढ़ाई करें तो मन से करें।
विद्याज्ञान स्कूल पहुंचे राज्यपाल के संबोधन के दौरान खूब ठहाके भी लगे। मंच संचालिका फर्राटेदार अंग्रेजी में बोल रही थीं। उन्होंने श्री नाईक को संबोधन के लिए बुलाया। माइक पकड़ते ही श्री नाईक ने छात्र-छात्राओं व शिक्षकों से पूछा-क्या मैं हिन्दी में बोल सकता हूं वैसे मैं अंग्रेजी में भी बोल लेता हूं।' इस बात पर दर्शक दीर्घा ठहाकों से गूंज उठी।
छात्र-छात्राओं से मुखातिब राज्यपाल ने अपने बचपन की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि वह डेढ़ हजार की आबादी वाले महाराष्ट्र के एक सामान्य से गांव में जन्मे थे। पिताजी गांव के प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर थे। उन्हें 75 रुपए प्रतिमाह पगार मिलती थी। इतनी तनख्वाह में तीन भाई और दो बहनों की पढ़ाई किसी बड़े शहर में सम्भव नहीं थी। इसलिए उनका नाम भी गांव के प्राइमरी स्कूल में ही लिखवा दिया गया।
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