इस बार यूपी की भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद ने एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव की 201वीं वर्षगांठ पर वहां पहुंचने की घोषणा की है। हालांकि प्रशासन ने उन्हें रैली की इजाजत नहीं दी है। इसी के मद्देनजर वहां अलर्ट लागू किया गया है। इस मौके पर आइए जानते हैं क्या है भीमा कोरेगांव और उससे जुड़ा दलितों का गौरमयी इतिहास।
भीमा-कोरेगांव को 201 साल पहले एक जनवरी 1818 को पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध के लिए जाना जाता है। इस युद्ध में अनुसूचित जाति के महार समुदाय ने पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेजों का साथ दिया था। अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी ने महार रेजिमेंट की बदौलत ही पेशवाओं को हराया था। महारों की इस विजय की याद में ही यहां ‘विजय स्तंभ’ की स्थापना की गई है, जहां प्रतिवर्ष एक जनवरी को हजारों लोग विशेषकर दलित समुदाय के लोग, युद्ध में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचते हैं। इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में शहीद होने वाले महार योद्धाओं के नाम अंकित हैं।
युद्ध में मराठाओं को हराने की वजह से अनुसूचित जातियों के लिए इस जगह को खास सम्मान मिला हुआ है। भीमराव अंबेडकर का समर्थन करने वाले अनुसूचित जाति के लोग इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यदाव की लड़ाई नहीं मानते हैं। दलित इस लड़ाई को अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवाओं पर जीत की तरह देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भीमा-कोरेगांव में हुई लड़ीई में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की अनुसूचित जाति (महार) के थे। इससे पहले महार, शिवाजी के समय से ही मराठा सेना का हिस्सा हुआ करते थे। बाजीराव द्वितीय ने अपनी ब्राह्मणवादी सोच की वजह से दलितों को सेना में भर्ती करने से इंकार कर दिया था। इस वजह से दलित मराठों से खफा थे।
Author: JAN TV Editorial Team
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