आपको बता देते है कि पिछले चुनाव में हनुमान बेनीवाल की आरएलपी ने 57 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे | बेनीवाल की पार्टी ने इनमें से तीन सीटों पर जीत हासिल की | जबकि दो सीटों पर उनके उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे | ऐसी 23 सीटें थीं | जहां बेनीवाल के बैनर से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे | जिससे उन सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी का सियासी गणित बिगड़ गया |
आरएलपी और आजाद समाज पार्टी का यह गठबंधन जाट और दलित वोटरों को लुभाने की कोशिश है | अगर ऐसा होता है तो ये बीजेपी और कांग्रेस के लिए चिंता की बात है | राजस्थान में मतदाताओं की कुल आबादी का 10 फीसदी हिस्सा जाट समुदाय से है | करीब 40 सीटों पर जाट समुदाय का सीधा असर है | अगर दलित समुदाय की बात करें तो करीब 18 फीसदी दलित वोटर है | राजस्थान विधानसभा की 200 सीटों में से 33 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 25 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। अब अगर दलित मतदाता और जाट मतदाता एक साथ आ गए तो आगामी विधानसभा का चुनावी समीकरण बदल सकता है |
आरएलपी और आजाद पार्टी के बीच गठबंधन के बाद अब सबकी नजरें इनके बीच सीट बंटवारे पर है | दोनों दलों का नेतृत्व संयुक्त रूप से इस बात पर कसरत कर रहा है कि कौन कितनी सीटों पर और कहां से कौन उम्मीदवार उतारेगा |इधर, चन्द्रशेखर आजाद का कहना है कि आरएलपी के साथ सीट शेयरिंग पर कोई विवाद नहीं है |
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