वॉशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट में आयोजित 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' के दौरान भारत और अमेरिका के बीच बदलते समीकरणों पर गंभीर चर्चा हुई। विशेषज्ञों और पैनलिस्ट राम माधव ने स्वीकार किया कि पिछले दो दशकों में रक्षा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्र में हुई प्रगति के बावजूद, वर्तमान में दोनों देशों के बीच "भरोसे की कमी" एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। चर्चा में यह बात सामने आई कि नीतियों में अनिश्चितता, काम की धीमी गति और उम्मीदों का मेल न खाना इस मजबूत रिश्ते को एक मुश्किल दौर में ले जा रहा है। कर्ट कैंपबेल ने उल्लेख किया कि यह तनाव केवल नीतिगत नहीं बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी है, जिससे भारतीय पक्ष में निराशा और नाराजगी देखी जा रही है।
साझा हितों की पुनर्रचना और भविष्य की राह
कॉन्फ्रेंस में स्टिमसन सेंटर की एलिजाबेथ थ्रेलकेल्ड ने बताया कि दोनों देश एक-दूसरे की सीमाओं को 'मजबूरी' के बजाय 'पसंद' मान रहे हैं, जो गलतफहमी बढ़ा रहा है। इस बाधा को दूर करने के लिए भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) और I2U2 जैसी रणनीतिक पहलों को फिर से सक्रिय करने की सलाह दी गई है। हालांकि, सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत टैरिफ और ऊर्जा आयात जैसे मुद्दों पर लचीलापन दिखाते हुए व्यापार समझौते की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का निष्कर्ष था कि वैश्विक संकटों के इस दौर में रिश्ते की मजबूती बनाए रखने के लिए लगातार राजनीतिक ध्यान और आपसी सीमाओं का सम्मान करना अनिवार्य है।
Author: JAN TV Editorial Team
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