(MAHARASHTRA, India)
हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता सदाशिव अमरापुरकर का निधन हो गया है, मुंबई के अस्पताल में रात 2.45 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली, लंबे समय से अमरापुरकर बीमार चल रहे थे, उन्हें फेफड़े में इन्फेक्शन हुआ था, 64 साल की उम्र में उनका निधन हुआ, अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर मुंबई के विले पार्ले के भाई दास ऑडिटोरियम में रखा जाएगा, अंतिम संस्कार कल शाम 4 बजे महाराष्ट्र के अहमदनगर में होगा, अहमदनगर में ही उनका जन्म हुआ था, अमरापुर ने दो फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीते, 1984 में उन्हें 'अर्द्ध सत्य' के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड मिला, वहीं 1991 में उन्हें 'सड़क' के लिए बेस्ट विलेन की ट्रॉफी जीती, इसके बाद उन्होंने अधिकतर मराठी फिल्में की और मराठी सिनेमा पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर लिया, 2012 में फिल्म 'बॉम्बे टॉकीज' में उन्हें अंतिम बार बड़े पर्दे पर देखा गया, 1980 और 1990 के दशक में हिंदी और मराठी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके सदाशिव अमरापुरकर का जन्म महाराष्ट्र के अमहमदनगर जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, सदाशिव का बचपन का नाम तात्या था और वो दोस्तों से बहुत मिलजुलकर रहते थे, शुरुआती पढाई अहमदनगर में करने के बाद सदाशिव अमरापुरकर ने पुणे यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में मास्टर्स की डिग्री हासिल की, बहुत ही प्रतिभावान कलाकार होने के साथ साथ वो अच्छे लेखक और निर्देशक भी थे, अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होने नाटकों में कई पुरस्कार जीते, 1983 में सबसे पहली फिल्म गोविंद निलहानी की अर्धसत्य थी जिसमें उन्होंने रमा शेट्टी की भूमिका निभाई थी, सदाशिव ने 300 से ज्यादा हिंदी, मराठी, बंगाली, उड़िया और हरियाणवी फिल्मों में काम किया, उनके मशहूर डायलागों में से एक उनका वो डायलॉग है जिसमें वो व्यवस्था के खिलाफ लड़ते नजर आते हैं, फरिश्ते फिल्म में वो एक आतंकवादी के रोल में नजर आते हैं, लेकिन आंखें फिल्म में सदाशिव एक ऐसे इंस्पेक्टर की भूमिका निभाते हैं जो उनकी खलनायक वाली भूमिका से बहुत अलग है, कभी रुलाने तो कभी हंसाने और कभी व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज आज भले खामोश हो गई हो लेकिन उनकी यादें कभी लोगों के मन से खत्म नहीं होंगी
Author: JAN TV Editorial Team
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