शंख के दो प्रकार प्रमुख रूप से प्रचलित हैं- दक्षिणावर्त और वामावर्त
शंख बजाने की मुद्रा में जब हाथ में लिया जाता है तो पकड़ने वाला भाग यानी हैंडल अगर सीधे हाथ में आता है तो वह शंख दक्षिणावर्ती होता है। यदि किसी शंख का हैंडल बाएं हाथ की ओर आता है तो शंख वामावर्ती होता है।
दक्षिणावर्ती शंख भी दो प्रकार का होता है- पुरुष शंख और स्त्री शंख।
मोटी परत वाला व भारी शंख को पुरुष शंख कहते हैं। पतली परत वाला व वजन में हल्के शंख को स्त्री शंख कहते हैं।
दक्षिणावर्ती शंख को घर में स्थापित की विधि
पूजन के समय पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठें। अब सामने लकड़ी का एक पटिया या बाजोट रखें, उस पर एक लाल वस्त्र बिछाएं। चांदी या तांबे की थाली रखें, उस पर कुमकुम से आठ पत्तियों वाले कमल की आकृति बनाएं। इस आकृति को अष्टदल कहा जाता है। उस पर दक्षिणावर्ती शंख को स्थापित करें। धूप-दीप करें। इसके बाद चावल के 108 दाने लेकर ‘ऊँ श्रीं श्रिये नमः’ बोलते हुए 108 दानों को ही बारी-बारी से शंख के मुख में डालते जाए। इस शंख को चावल के दानों सहित लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में या फिर पूजा घर में स्थापित कर दें।
दक्षिणावर्ती शंख का महत्व
दक्षिणावर्ती शंख की तारीफ में ग्रन्थों कहा गया है-
दक्षिणावर्तशंखोय यस्य सद्मनि तिष्ठति।
मंगलानि प्रवर्तन्ते तस्य लक्ष्मीःस्वयं स्थिरा।।
कांचनी मेखलां कृत्वा शुचिस्थाने निधापयेत्।
शुचिस्तं पूजयेन्नित्यं कुसुमैश्चन्दनैस्तथा।।
दुग्धेन स्थापनीयोऽयं नैवेद्येस्तोषयेत् सदा।
दक्षिणावर्त शंखोऽयं सर्वलक्ष्मीफलप्रदः।।
दक्षिणावर्त शंख जिस घर में रहता है, वहां हर तरह का मंगल मतलब शुभ होता रहता है। लक्ष्मी कृपा बनी रहती है। स्वर्ण की रस्सी बनाकर इसे पवित्र स्थान पर रखें और पुष्प व चन्दन से पूजन करें। इसमें दूध भरकर रखें तथा नैवेद्य चढ़ाकर प्रसन्न करें। ऐसा करने से हमेशा लक्ष्मी की प्राप्ति होगी।
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