सांवराद की घटना के लिए नेता जिम्मेदार, उन पर हो कड़ी कार्यवाही : IPS मोनिका सेन
(Degana, Nagaur) कुख्यात अपराधी आनंदपाल की एनकाउंटर में मौत के बाद चले घटनाक्रम के बीच 12 जुलाई को उसके गांव सांवराद में हुई राजपूतों की श्रद्धांजलि सभा में हुए उत्पात के दौरान अजमेर की सहायक पुलिस अधीक्षक आईपीएस मोनिका सेन भी ड्यूटी पर थीं। वे उस वक्त नागौर के एसपी परीश देशमुख के साथ स्टेशन जा रही थीं, तब उन्हें भीड़ ने घेर लिया। उसके बाद क्या हुआ, यह मोनिका सेन ने नवज्योति के कोसिनोक जैन को बताया। पेश है उनकी जुबानी उस दिन सांवराद की कहानी। 12 जुलाई को शाम करीब 6 बजे सूचना मिली कि हजारों लोग सांवराद रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ रहे हैं और वो रेलवे ट्रैक को उखाड़ना चाहते हैं। हमें जानकारी थी कि कुछ पुलिस अफसर स्थिति से निपटने के लिए वहां पहले से मौजूद थे। अचानक हमें सूचना मिली कि 8 पुलिस कांस्टेबलों को एक जगह घेर भीड़ ने बंदी बना लिया है। उनमें से तीन पर केरोसिन छिड़क दिया है। वे केरोसिन से भीग गए और जिन्दा जलाने की तैयारी चल रही है। लेकिन शायद उन्हें माचिस नहीं मिल पाई।
पुलिस के साथ ऐसा बर्ताव। यह हम लोगों से सहन नहीं हुआ
मैं और सर, अपने दोनों गनमैन के साथ तेजी से उस जगह के लिए निकल गए। शाम के करीब 7 बजकर 30 मिनट हो रहे थे, जब हम रेलवे स्टेशन के नजदीक पहुंचे, तो वहां लोगों के हुजूम ने हमें घेर लिया और गाड़ी को डंडे मारने लगे। इतने में हमारा गनमैन नीचे उतरा, पर लोगों पर असर नहीं हुआ। फिर भीड़ हमारी गाड़ी को हिलाने लगी और कांच तोड़ दिए। इतने में मैं और सर गाड़ी से कूद गए और उन्होंने हमारी आंखों के सामने गाड़ी को आग लगा दी। फिर हमारे पीछे से पत्थर आने शुरू हो गए और भीड़ को जो दिखा वो उठाकर हम पर मारने लगी। कुछ पत्थर मुझे आकर लगे। इससे मेरे हाथ, पैर और कंधे पर चोटें आर्इं। मैंने अपनी आंखों के सामने गार्ड को पिटते हुए देखा, पर विवशता के कारण मैं कुछ नहीं कर सकी। मुझ पर भी भीड़ ने हमला किया। उन लोगों ने मुझे अपनी तरफ खींचना शुरू किया। मैंने सुरक्षा के लिहाज से हेलमेट पहन रखा था। इस खींचतान में हेलमेट उन लोगों के हाथ में आ गया। तब उन्हें अहसास हुआ कि वो एक महिला पर हमला कर रहे हैं।
भीड़ में कुछ 4 से 5 अच्छे आदमी थे। वो मुझे पास ही के एक घर में ले गए, जहां जाकर मैंने शरण ली। उस घर की महिलाओं ने मुझे राजपूती परिधान पहनने को कहा, ताकि मुझे पहचाना नहीं जा सके। उन्होंने ही मुझे राजपूती परिधान लाकर दिए। मैंने उनके कहने पर अपनी वर्दी के ऊपर राजपूती ड्रेस डाल ली और एक जगह बैठ गई। घर वालों ने मेरे साथ बहुत अच्छा बर्ताव किया। मुझे पानी पिलाया और खाने के लिए पूछा। मैंने उनसे कहा कि वो पुलिस अधिकारियों को इसकी सूचना दे दें, ताकि वे मुझे यहां से ले जाएं। मैं उस घर में करीब आधा घंटे तक रही। फिर मुझे छत पर ले जाकर बताया कि अब भीड़ चली गई है। इतने में लाडनूं आ गए और पूरी फोर्स भी आ चुकी थी। मैं रात 9.10 बजे के करीब गाड़ी में बैठी और थाने के लिए रवाना हो गई। 10 बजे तक थाने पहुंची। यह ढाई घंटे मुझे जिन्दगी भर याद रहेंगे। अगर वे घर वाले पनाह नहीं देते तो मेरे साथ कुछ भी हो सकता था। मैं इस घटना और जो पुलिस वाले जख्मी हुए, उनके लिए नेताओं को जिम्मेदार मानती हूं। जिन नेताओं ने इतनी भीड़ इकट्ठी की वे इन सबके लिए जिम्मेदार हैं। उन पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए।

Author: JAN TV Editorial Team

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