रक्षा मंत्रालय के ताजा दिशा-निर्देशों के तहत ब्यूरोक्रेट्स और सशस्त्र बलों के अधिकारियों को कोई भी खर्च करने से पहले इंटीग्रेटेड फाइनेंसियल एडवाइजर्स (आईएफए) से अनुमति लेनी होगी। भले ही वह खर्च कितना ही छोटा क्यों न हो। इस निर्देशों से सरकारी अधिकारियों में रोष उत्पन्न हो गया है। उनका कहना है कि इस निर्णय से रक्षा खरीद में और देरी होगी जो पहले से ही देरी की समस्या से जूझ रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में रक्षा मंत्रालय द्वारा अधिकारियों की वित्तीय शक्तियां संशोधित की गईं थीं। सूत्रों के अनुसार आदेश में कहा गया है कि इस व्यवस्था से आईएफए के ढांचे को और मजबूत बनाना है। कंट्रोलर जनरल ऑफ डिफेन्स एकाउन्ट्स को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह और एडवाइजर्स की नियुक्ति करें ताकि अनुमति लेने की इस व्यवस्था को निचले स्तर तक अमलीजामा पहनाया जा सके। उधर, सेना के एक अधिकारी के अनुसार इस व्यवस्था से एप्रूवल लेने की प्रक्रिया और लम्बी हो जाएगी। क्या मंत्रालय को हम पर विश्वास नहीं है?
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