संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, उत्सव का आयोजन उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, समाज कल्याण विभाग, जनजाति विकास विभाग और पर्यटन निदेशालय के संयुक्त तत्वावधान में किया जाएगा।
उत्सव में उत्तर प्रदेश के साथ मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, त्रिपुरा, असम, छत्तीसगढ़ और हरियाणा के कलाकार शामिल होंगे। विभिन्न राज्यों के सांस्कृतिक दल लोकनृत्य, संगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों के जरिए अपनी जनजातीय विरासत को मंच पर प्रस्तुत करेंगे। अन्य राज्यों के कलाकारों को आमंत्रित करने के लिए उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज के माध्यम से भी प्रयास किए जाएंगे।
उत्सव में जनजातीय कलाकारों के साथ घुमंतू समुदायों की पारंपरिक कलाओं को भी विशेष स्थान दिया जाएगा। यहां बीन वादन, जादू, कठपुतली, बहुरूपिया और नट-नटी की प्रस्तुतियां होंगी। लोकनायक भगवान बिरसा मुंडा के जीवन और योगदान पर आधारित रंगोली तथा नाटक भी आयोजित किए जाएंगे।
विलुप्त होती लोक विधाओं को उत्सव का प्रमुख आकर्षण बनाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी इन पारंपरिक कलाओं से परिचित हो सके और इन्हें संरक्षित करने वाले कलाकारों को मंच मिल सके।
उत्सव में शिल्प मेले का भी आयोजन होगा, जिसमें 150 से अधिक शिल्पकार अपनी कला और उत्पादों का प्रदर्शन करेंगे। यहां जनजातीय व्यंजनों, हस्तशिल्प, पारंपरिक आभूषणों और जनजातीय वाद्ययंत्रों की दुकानें लगाई जाएंगी।
इसके अलावा जनजातीय चित्रकला और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी तथा कार्यशालाएं आयोजित होंगी। मूंज और गेहूं के डंठल से उपयोगी एवं सजावटी सामग्री बनाने का प्रदर्शन भी किया जाएगा। जनजातीय जीवन और परंपराओं को करीब से समझाने के लिए आयोजन स्थल पर ग्रामीण परिवेश तैयार किया जाएगा। जनजातीय संस्कृति और परंपराओं पर आधारित पुस्तकों की बिक्री की व्यवस्था भी होगी।
इस वर्ष उत्सव में मध्य प्रदेश को थीम स्टेट बनाया गया है। इसके तहत राज्य की जनजातीय कला, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को विशेष रूप से प्रस्तुत किया जाएगा। आयोजन में विदेशी कलाकार भी शामिल होंगे। इससे विभिन्न देशों के सांस्कृतिक समूहों को अपनी प्रस्तुतियां देने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अवसर मिलेगा।
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि युवाओं को जनजातीय संस्कृति से जोड़ने के लिए स्थानीय विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को भी उत्सव में शामिल किया जाएगा। विद्यार्थियों को लोककलाओं, जनजातीय शिल्प, पारंपरिक खानपान और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।
चार दिवसीय आयोजन के दौरान संगोष्ठी, चित्रकला प्रदर्शनी और हस्तशिल्प कार्यशालाओं के माध्यम से जनजातीय समाज के इतिहास, परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान पर चर्चा होगी। मंत्री के अनुसार, यह उत्सव जनजातीय कला और पारंपरिक ज्ञान को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनेगा।
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