राज्य में संचालित करीब 6,838 खदानों से अरावली के प्राकृतिक स्वरूप पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। खनन के कारण पहाड़ियों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। इसका असर वनस्पतियों के साथ-साथ वन्यजीवों और स्थानीय जलवायु पर भी पड़ रहा है। पौधों की संख्या में कमी आने से पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान बढ़ने की आशंका भी गहरा रही है।
इन जिलों में जारी है खनन का दबाव
अजमेर जिले के खरखड़ी, हाथीखेड़ा, अजयसर, बोराज, किशनगढ़, पुष्कर, श्रीनगर और सावर सहित कई क्षेत्रों में खनन गतिविधियां जारी हैं। इसके अलावा उदयपुर, जयपुर, राजसमंद, सिरोही, अलवर, सीकर, चित्तौड़गढ़ और डूंगरपुर समेत राजस्थान के अन्य जिलों में भी अरावली क्षेत्र खनन के दबाव का सामना कर रहा है।
सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की 2025-26 की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1967-68 के बाद से राजस्थान में अरावली का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो चुका है। यह आंकड़ा पर्वतमाला के लगातार बदलते स्वरूप और पर्यावरण पर पड़ रहे प्रभाव को दर्शाता है।
बदल रहा अरावली का तापमान, बिगड़ रहा प्राकृतिक संतुलन
अरावली क्षेत्र की जलवायु में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। उपलब्ध पुराने आंकड़ों के अनुसार, 1980 के दशक तक गर्मियों में यहां का तापमान करीब 18 से 20 डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में 6 से 8 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता था। वहीं, अब अजमेर, सिरोही, राजसमंद, जयपुर और अलवर सहित कई क्षेत्रों में तापमान 32 से 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पेड़-पौधों की कमी, वन क्षेत्र में अतिक्रमण और पहाड़ियों की लगातार कटाई से प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। अरावली की वनस्पतियां स्थानीय पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में इनका तेजी से कम होना आने वाले समय में गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियां पैदा कर सकता है।
औषधीय पौधों पर मंडरा रहा विलुप्त होने का खतरा
अरावली पर्वतमाला अपनी समृद्ध जैव विविधता और औषधीय वनस्पतियों के लिए जानी जाती है। यहां कई ऐसे पौधे पाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में किया जाता रहा है। लेकिन अवैध खनन और वन क्षेत्रों में अतिक्रमण के चलते इनकी प्राकृतिक उपलब्धता प्रभावित हो रही है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि करीब एक हजार औषधीय पौधों का रेड जोन में पहुंचना चिंता का विषय है। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में विलायती बबूल का तेजी से फैलना भी स्थानीय वनस्पतियों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इससे क्षेत्र की मूल वनस्पतियों के विकास और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
रेड लिस्ट में शामिल प्रमुख औषधीय पौधे और उनके पारंपरिक उपयोग
अरावली क्षेत्र में पाए जाने वाले कई औषधीय पौधे अपनी उपयोगिता के लिए पहचाने जाते हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
गूगल: पारंपरिक रूप से कोलेस्ट्रॉल, गठिया और वजन नियंत्रण से जुड़े उपचारों में उपयोग।
सफेद मूसली: रोग प्रतिरोधक क्षमता और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़े पारंपरिक उपयोग।
सफेद चंदन: त्वचा की देखभाल और शीतलता के लिए इस्तेमाल।
-रोहन: पारंपरिक चिकित्सा में बुखार और पेट दर्द के लिए उपयोग।
अश्वगंधा: तनाव कम करने और शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रचलित।
अंजन/धोकड़ा: पारंपरिक रूप से गैस्ट्रिक विकारों में उपयोग।
पाषाणभेद: गुर्दे और मूत्राशय की पथरी से जुड़े पारंपरिक उपचारों में इस्तेमाल।
जख्म-ए-हयात: चोट और घावों के उपचार में पारंपरिक उपयोग।
अर्जुन: हृदय स्वास्थ्य से जुड़े पारंपरिक उपचारों में इस्तेमाल।
बहेड़ा: त्रिफला के प्रमुख घटकों में से एक।
हरड़: पाचन तंत्र से संबंधित समस्याओं में पारंपरिक उपयोग।
गूलर:नकसीर और बवासीर जैसी समस्याओं के पारंपरिक उपचार में इस्तेमाल।
करंज: त्वचा संबंधी समस्याओं जैसे दाद, खाज और खुजली में पारंपरिक उपयोग।
अरावली में कहां मिलते हैं औषधीय पौधे?
राजस्थान में अरावली के कई हिस्से औषधीय वनस्पतियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें अजमेर का तारागढ़ और पुष्कर-नाग पहाड़ क्षेत्र, कुंभलगढ़ और जरगा की पहाड़ियां, सिरोही का माउंट आबू और भाखर क्षेत्र प्रमुख हैं। इसके अलावा उदयपुर और राजसमंद के पहाड़ी इलाकों में भी कई तरह की औषधीय वनस्पतियां पाई जाती हैं।
अरावली केवल पहाड़ियों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान के पर्यावरण और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में खनन और अतिक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हुआ तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों के प्राकृतिक संसाधनों पर भी पड़ सकता है। अरावली का संरक्षण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य के पारिस्थितिक भविष्य से जुड़ा सवाल बन गया है।
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