बारां में सिंचाई सुविधाओं का होगा विस्तार, 13 परियोजनाओं से 1.16 लाख हेक्टेयर जमीन तक पहुंचेगा पानी
(Antah, Baran) बारां। राजस्थान के बारां जिले में खेती को बारिश पर निर्भरता से बाहर निकालने और किसानों को सिंचाई की बेहतर सुविधाएं देने की दिशा में काम किया जा रहा है। जिले में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से कई सिंचाई परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं के पूरा होने के बाद जिले के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलने की उम्मीद है।

बारां का भौगोलिक क्षेत्रफल करीब 6 लाख 95 हजार 550 हेक्टेयर है। इसमें लगभग 3 लाख 53 हजार 616 हेक्टेयर जमीन खेती योग्य है। इसके बावजूद जिले में मानसून के दौरान होने वाली बारिश के पानी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। वर्तमान में जिले के बड़े और छोटे बांधों तथा तालाबों के माध्यम से करीब 1 लाख 8 हजार 692 हेक्टेयर भूमि को ही सिंचाई सुविधा मिल पा रही है।

सिंचाई विभाग के अनुसार, जिले में इस समय करीब 13 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इनके पूरा होने पर अतिरिक्त 1 लाख 16 हजार 205 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के दायरे में लाने का लक्ष्य है। इसके अलावा नाहरगढ़, केलवाड़ा, समरानियां और छबड़ा क्षेत्र में भी सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के लिए योजनाओं की तैयारी की जा रही है।

हथियादेह परियोजना से 54 गांवों को मिलेगा फायदा

बारां जिले की हथियादेह मध्यम सिंचाई परियोजना के तहत हथियादेह नाले पर बांध का निर्माण पूरा किया जा चुका है। इस बांध में करीब 46.95 मिलियन घनमीटर पानी संग्रहित किया जा सकेगा। परियोजना से जनजातीय बहुल क्षेत्र के 54 गांवों को लाभ मिलने की संभावना है। इसके माध्यम से लगभग 9,900 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। फिलहाल परियोजना के कमांड क्षेत्र में डिग्गी, पंप हाउस और पाइपलाइन नेटवर्क तैयार करने का काम किया जा रहा है। विभाग ने जून 2027 तक इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

अंधेरी नदी पर बनेगा नया बांध

छबड़ा तहसील के मूण्डकिया गांव के पास अंधेरी नदी पर एक नए बांध के निर्माण की योजना बनाई गई है। प्रस्तावित बांध की लंबाई करीब 3 किलोमीटर होगी। इसमें लगभग 45.29 मिलियन घनमीटर पानी जमा करने की क्षमता विकसित की जाएगी। इस परियोजना से छबड़ा और छीपाबड़ौद क्षेत्र के 56 गांवों की करीब 9,850 हेक्टेयर जमीन को सिंचाई का लाभ मिल सकेगा। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 830 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके निर्माण के लिए विभाग की ओर से निविदा प्रक्रिया भी पूरी की जा चुकी है।

पार्वती नहर प्रणाली से किसानों को राहत

जिले में पहले से मौजूद सिंचाई व्यवस्था को बेहतर बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। पार्वती नहर प्रणाली के तहत मुख्य नहर और उससे जुड़ी नहरों के सुदृढ़ीकरण का काम पूरा किया जा चुका है।
इस नहर प्रणाली से अटरू, बारां और मांगरोल तहसीलों के 57 गांवों की लगभग 12,531 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलती है। नहरों की मरम्मत और मजबूती से पानी के वितरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

शाहाबाद क्षेत्र में तीन बांध बनाने की तैयारी

शाहाबाद क्षेत्र में कुंजाय, सेमरी और बमनगवां सिंचाई परियोजनाओं के तहत करई नदी पर तीन बांध बनाए जाने प्रस्तावित हैं। इन बांधों में कुल मिलाकर 14.50 मिलियन घनमीटर से अधिक पानी का संग्रहण किया जा सकेगा। जलाशयों में पानी का स्तर नियंत्रित रखने और अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए बांधों में गेट लगाए जाएंगे। इस योजना से आसपास के करीब 34 गांवों की 5,600 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ पहुंचाने का लक्ष्य है। विभाग ने इन कार्यों को तीन साल की अवधि में पूरा कर सिंचाई शुरू करने की योजना बनाई है।

अन्य क्षेत्रों में भी तैयार हो रही सिंचाई योजनाएं

बारां जिले में कुछ अन्य क्षेत्रों को भी सिंचाई सुविधाओं से जोड़ने की तैयारी है। नाहरगढ़ क्षेत्र की करीब 9,800 हेक्टेयर जमीन के लिए योजना बनाई जा रही है। वहीं केलवाड़ा और समरानियां क्षेत्र की लगभग 15 हजार हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा देने की दिशा में भी काम चल रहा है। इसके अलावा पार्वती नदी के बाएं किनारे पर छबड़ा क्षेत्र की करीब 16 हजार हेक्टेयर जमीन के लिए सिंचाई संसाधन विकसित करने की डीपीआर तैयार करवाई जा रही है।

सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता जितेन्द्र शेखर के अनुसार, जिले में सिंचाई के साधनों को बढ़ाने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है। मौजूदा परियोजनाओं के अलावा निर्माणाधीन योजनाओं से 1 लाख 16 हजार 205 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया है।

बारां जिले में चल रही ये परियोजनाएं आने वाले समय में कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं। बांधों, नहरों और जल संग्रहण की सुविधाओं का विस्तार होने से किसानों को सिंचाई के लिए बेहतर विकल्प मिलेंगे और खेती की मानसून पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
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