अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय में तलाक के मामलों में मुस्लिम महिलाओं द्वारा कथित लैंगिक भेदभाव सहित कई मुद्दों को उठाने वाली याचिकाओं को विरोध करते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी समुदाय के पर्सनल कानूनों को ‘फिर से नहीं लिखा’ जा सकता। बोर्ड ने शीर्ष अदालत में अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि बहुविवाह, तीन बार तलाक (तलाक ए बिद्दत) और निकाह हलाला की मुस्लिम परंपराओं से संबंधित विवादित मुद्दे ‘विधायी नीति’ के मामले हैं और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
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