राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए समय सीमा तय करने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 14 सवाल:
(India) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए तीन महीने की समयसीमा 14 अप्रैल, 2025 तय करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे कार्यपालिका के मामलों में न्यायपालिका का अनावश्यक हस्तक्षेप माना है। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि संविधान में राष्ट्रपति की भूमिका संवैधानिक संरक्षक की है और न्यायपालिका को कार्यपालिका के विवेकाधीन निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले ने सीधे तौर पर राष्ट्रपति की स्वतंत्रता और विवेक पर आक्रमण किया है। यह बयान राष्ट्रपति की संवैधानिक सीमाओं और न्यायपालिका के दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह मामला न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण बहस को जन्म देगा।

साथ ही साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल 2025 के उस फैसले पर केंद्रित हैं, जिसमें राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए राज्य के विधेयकों पर फैसला लेने की समय सीमा तय की गई है। यह फैसला तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल के मामले में आया है, जिसमें कोर्ट ने राज्यपाल के लिए एक महीने और राष्ट्रपति के लिए तीन महीने की समय सीमा तय की थी। राष्ट्रपति ने इस फैसले को संवैधानिक व्यवस्था पर अतिक्रमण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है।

* अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के विकल्प: विधान सभा द्वारा पारित विधेयक
प्रस्तुत किए जाने पर राज्यपाल के पास कौन से संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं?
मंत्रिपरिषद की सलाह: क्या राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत मंत्रिपरिषद की सलाह
से बाध्य है?
* न्यायिक समीक्षा: क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल का निर्णय न्यायिक समीक्षा
के अधीन है?
* अनुच्छेद 361 का प्रभाव: क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के अनुच्छेद 200 के कार्यों
की न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह से रोकता है?
* समय सीमा का निर्धारण: यदि संविधान में समय सीमा का उल्लेख नहीं है, तो क्या
अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की शक्तियों के प्रयोग के लिए समय सीमा और
तरीके को न्यायिक आदेशों द्वारा निर्धारित किया जा सकता है?
* राष्ट्रपति के निर्णय की समीक्षा: क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति का निर्णय
न्यायिक समीक्षा के अधीन है?
* राष्ट्रपति के लिए समय सीमा: क्या अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा शक्तियों के
प्रयोग के लिए समय सीमा और तरीके को न्यायिक आदेशों द्वारा निर्धारित किया जा
सकता है?
* सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति: क्या सर्वोच्च न्यायालय विधानमंडलों द्वारा पारित
विधेयकों को राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति देने के लिए समय सीमा तय कर
सकता है?
* संविधान संशोधन: क्या सर्वोच्च न्यायालय के पास संविधान में संशोधन करने की
शक्ति है?
* बाध्यकारी आदेश: क्या सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयक को
स्वीकृति देने के लिए बाध्य कर सकता है?
* राय लेने की बाध्यता: क्या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143 और 145(3) के तहत सर्वोच्च
न्यायालय की राय लेने का अधिकार है?
* पूर्व अधिकार क्षेत्र: क्या कानून के अधिनियमन से पहले अनुच्छेद 200 और 201 के
तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा संभव है?
* स्वीकृति की अवधारणा: क्या सर्वोच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 142 के तहत
स्वीकृत विधेयकों को संवैधानिक मानना ​​संवैधानिक है, जैसा कि तमिलनाडु मामले में
हुआ?
* संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन: क्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय सीमा तय करना
संवैधानिक व्यवस्था और मूल्यों का उल्लंघन करता है?

राष्ट्रपति मुर्मू ने यह राय तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के जवाब में मांगी है, जिसमें कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर की जाने वाली देरी को "पॉकेट वीटो" करार दिया था और समय सीमा तय की थी। राष्ट्रपति का तर्क है कि संविधान (अनुच्छेद 200 और 201) में ऐसी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है और यह फैसला राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों को सीमित करता है। केंद्र सरकार और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस फैसले पर आपत्ति जताई है।

Author: JAN TV Editorial Team

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