विकारों को नष्ट कर प्रकाश की अनुभूति कराता है गुरू
(India)
भारतीय संस्कृति में गुरु का पद सर्वोच्च माना गया है। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य कहा गया है। प्रथम स्तर पर गुरु बालक को शिक्षा देकर इस योग्य बनाता है कि वह अपने कर्मक्षेत्र में सफल हो सके। द्वितीय स्तर पर गुरु अपने शिष्य के अंतर्मन में व्याप्त अंधकार (अज्ञान व अविद्या) और विकारों को नष्ट कर प्रकाश (ज्ञान) की अनुभूति कराता है। गुरु शिष्य को ज्ञान का मार्ग दिखाने के साथ-साथ उसकी चेतना का विस्तार भी करता है। गुरु वह सेतु है जिस पर चलकर शिष्य परमात्मा तक पहुंचता है, तभी तो कबीर कहते हैं कि गुरु जी आप धन्य हैं कि आपने भगवान के बारे बता दिया। इसी तरह सूफी महाकवि जायसी भी मानते हैं कि इस संसार में गुरु के बगैर कोई भी उस परब्रह्मा को प्राप्त नहीं कर सकता है। ‘बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।’ गोस्वामी तुलसीदास भी हनुमान चालीसा में हनुमान जी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा करो- जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करौ गुरुदेव की नाई। विचारणीय प्रश्न यह है कि सच्चा गुरु मिले कैसे? क्योंकि आज के इस परिवेश में सच्चा गुरु मिलना सहज नहीं है। यदि गुरु ही अज्ञानी है, तो वह शिष्य को कैसे मार्ग दिखा सकेगा? वह तो स्वयं को भी और शिष्य को भी पतन के गर्त में ढकेल देगा। संत कबीर ने भी गुरु की महत्ता का प्रतिपादन अपने तरीके से किया है। गुरु सच्चा ज्ञानी हो और शिष्य में ज्ञान पाने की ललक हो, तभी गुरु और शिष्य दोनों धन्य हो उठते हैं।

Author: JAN TV Editorial Team

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