ये 4 लोग शत्रु की तरह होते हैं, इनसे हमेशा संभलकर रहना चाहिए
(India) जिन्हें कोई यदि समझ ले और उन्हें अपना ले तो उसका जीवन अन्य लोगों से अलग और सुखद हो जाता है। इसलिए हर इंसान को हमारे ग्रंथों में बताई कुछ ऐसी बातों को याद रखना चाहिए और उन्हें जीवन में अपनाने की कोशिश करना चाहिए।
ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी।
भार्या रूपवती शत्रु: पुत्र: शत्रुरपण्डित:।।
यानी कर्ज करने वाला पिता, व्यभिचार करने वाली माता, सुंदर किंतु पति से प्रेम न रखने वाली स्त्री और मूर्ख पुत्र शत्रु की तरह होते हैं।

को धन्यो बहुभि: पुत्रै: कुशूलापूरणाढकै:।
वरमेक: कुलालम्बी यत्रविश्रयूते पिता।।

यानी भूसी से भरे बर्तन की तरह कई मूर्ख पुत्रों से कोई व्यक्ति महान नहीं होता, किंतु कुटुंब का पालन-पोषण करने और गौरव बढ़ाने वाला 1 पुत्र ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उससे पिता को सारे संसार में ख्याति मिलती है।अवश्यम्भाविनो भावा भवन्ति महतामपि।
नग्नत्वं नीलकण्ठस्य महाहिशयनं हरे:।।

अर्थ है कि किसी भी प्रतापी, वैभवशाली और महान पुरुषों व चरित्रों को भी कई तरह के सांसारिक सुख व दु:ख का सामना करना ही पड़ता है। उसी तरह जैसे खुद महादेव को भी बिना वस्त्र के दिगम्बर रूप में रहना पड़ता है और जगतपालक भगवान विष्णु को शय्या के बिना शेषनाग जैसे भुजंग पर सोना पड़ता है, इसलिए सांसारिक जीवन में व्यर्थ के संताप व चिंताओं को नहीं पालना चाहिए।

न संशयमनारूह्य नरो भद्राणि पश्यति।
संशयं पुनरारूह्य यदि जीवति, पश्यति।।

अर्थ है कि जब तक कोई इंसान जन्म-मृत्यु से जुड़े जोखिम नहीं उठाता है, तब तक वह सुख-सौभाग्य नहीं बटोर पाता यानी उसका कल्याण नहीं होता। एक बार किसी भी सही उद्देश्य से कोई भी जोखिम उठाकर वह जीवित रहता है, तो उसका कल्याण निश्चित है यानी वह शुभ फल प्राप्त करता है। सरल शब्दों में साहस में भी महालक्ष्मी का वास होता और साहसी इंसान को ऐसी लक्ष्मी कृपा से ही बहुत शुभ फल मिलते हैं।
माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।

सरल शब्दों में मतलब है कि ऐसे माता व पिता शत्रु की तरह होते हैं, जो अपनी संतान या पुत्र को विद्याध्ययन नहीं करवाते, क्योंकि ऐसा विद्याहीन या अशिक्षित पुत्र विद्वानों व शिक्षित लोगों के बीच वैसे ही शोभा नहीं देता, जिस तरह हंसो के बीच बगुला शोभा नहीं देता।

Author: JAN TV Editorial Team

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