जयंती के बारे में
कौन थी शबरी माता?
माता शबरी का वास्तविक नाम ‘श्रमणा’ था और वह भील समुदाय की ‘शबरी’ जाति से संबंध रखती थी.। शबरी के पिता भीलों के राजा थे।शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का किया। उस समय विवाह में जानवरों की बलि देने का नियम था।
माता शबरी की शादी के लिए भी सैकड़ों बकरे-भैंसे बलिदान के लिए इकट्ठे किये गये। इस पर शबरी ने अपने पिता से पूछा- ‘ये सब जानवर क्यों इकट्ठे किये गये हैं?’ पिता ने कहा- ‘तुम्हारे विवाह के उपलक्ष में इन सब की बलि दी जायेगी।
यह सुनकर बालिका शबरी का मन बहुत दूखी हुआ, और वह विवाह से पहले ही रात के समय घर से भाग गई। इसके बाद उन्होने अपना पूरा जीवन राम भगवान की भक्ति में लगर दिया। शबरी की कथा रामायण, भागवत, रामचरितमानस, सूरसागर, साकेत आदि ग्रंथों में मिलती है।
शबरी माला देवी की होती है पूजा
शबरीमाला मंदिर में इस दिन खास तौर पर मेला लगता है एवं पूजन-अर्चना होता है। शबरी को देवी का स्थान प्राप्त हुआ एवं साथ ही साथ मोक्ष की प्राप्ति भी हुई।
शबरी जंयती के दिन शबरी को देवी स्वरूप में पूजा जाता है, यह जयंती श्रद्धा एवं भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है। ऐसी मान्यता है कि शबरी माला देवी की पूजा करने से वैसे ही भक्ति भाव की कृपा मिलती है जैसे शबरी ने भगवान राम से प्राप्त की थी।
Author: JAN TV Editorial Team
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