उस समय वहां कर्ण भी मौजूद थे। जब उन्हें यह बात पता चली, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपने महल के दरवाजे, खिड़कियां और फर्नीचर जो चंदन की लकड़ियों से बने थे, तोड़कर उस व्यक्ति को दे दिए, ताकि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सके।
बाद में युधिष्ठिर ने कर्ण से पूछा, "तुमने इतना बड़ा दान बिना किसी सोच-विचार के कैसे कर दिया?"
कर्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "राजन, दान तब नहीं होता जब कोई मांगने आए, बल्कि तब होता है जब देने वाला खुद पहचान ले कि किसे क्या चाहिए।"
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा धर्म केवल न्याय नहीं, बल्कि समय पर किया गया निःस्वार्थ दान भी है। कर्ण की यह भावना आज भी लोगों को प्रेरणा देती है कि मदद की असली कीमत उसकी समयबद्धता और नीयत में होती है।
Author: JAN TV Editorial Team
DISCLAIMER: इस वेबसाइट पर दी गई जानकारी केवल सामान्य एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। हमने जानकारी को सटीक रखने का प्रयास किया है, लेकिन इसकी पूर्णता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं दी जाती। तृतीय-पक्ष वेबसाइटों या स्रोतों की सामग्री पर हमारा नियंत्रण नहीं है। इस जानकारी के आधार पर लिया गया कोई भी निर्णय आपके अपने विवेक और जोखिम पर होगा।